बेतिया/पटना: बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को जड़ से मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला लिया है। अपनी राज्यव्यापी 'समृद्धि यात्रा' के पहले दिन पश्चिम चंपारण के बेतिया से हुंकार भरते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट घोषणा की कि अब राज्य के सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस (Private Practice) नहीं कर सकेंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार एक ऐसी नई नीति तैयार कर रही है जिसके तहत सरकारी डॉक्टरों को अपना पूरा समय और ध्यान केवल सरकारी अस्पतालों में ही देना होगा।
क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?
मुख्यमंत्री ने जनसभा को संबोधित करते हुए बताया कि उन्हें लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि सरकारी डॉक्टर अस्पतालों से गायब रहते हैं या मरीजों को अपने निजी क्लिनिक पर बुलाते हैं।
- डॉक्टरों की उपलब्धता: इस रोक से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति बढ़ेगी।
- मरीजों को राहत: गरीब मरीजों को समय पर इलाज मिलेगा और उन्हें निजी नर्सिंग होम के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
- जवाबदेही: सरकारी संसाधनों का उपयोग करने वाले डॉक्टरों की पहली जिम्मेदारी अब केवल आम जनता के प्रति होगी।
'सात निश्चय-3' के तहत बड़ा बदलाव
यह निर्णय राज्य सरकार के 'सात निश्चय-3' (2025-2030) के संकल्प "सुलभ स्वास्थ्य-सुरक्षित जीवन" का हिस्सा है। सरकार ने इस नीति को लागू करने के लिए कमर कस ली है:
- हाई-लेवल कमेटी: स्वास्थ्य विभाग ने 6 सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता निदेशक प्रमुख (नर्सिंग) डॉ. रेखा झा कर रही हैं। यह कमेटी डॉक्टरों के संगठनों और अन्य हितधारकों से सुझाव लेकर अंतिम रिपोर्ट सौंपेगी।
- इनके लिए विशेष भत्ते (NPA): माना जा रहा है कि प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ने के बदले डॉक्टरों को 'नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस' (NPA) दिया जाएगा, जैसा कि AIIMS के डॉक्टरों को मिलता है।
- ग्रामीण प्रोत्साहन: गांवों और दूरदराज के इलाकों में तैनात डॉक्टरों के लिए सरकार अलग से प्रोत्साहन राशि (Incentives) देने पर भी विचार कर रही है।
बिचौलियों पर भी होगी स्ट्राइक
स्वास्थ्य सचिव लोकेश कुमार सिंह ने सभी जिलाधिकारियों (DM) को निर्देश दिए हैं कि वे विशेष निरीक्षण टीमें बनाएं। ये टीमें अस्पतालों में घूम रहे उन बिचौलियों को पकड़ेंगी जो मरीजों को बहला-फुसलाकर निजी नर्सिंग होम, जांच केंद्रों या खास दवा दुकानों पर भेजते हैं।
"पहले क्या था, अब क्या है"
नीतीश कुमार ने 2005 से पहले की स्थिति की तुलना करते हुए कहा कि पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में महीने में बमुश्किल 39 मरीज आते थे, जो अब बढ़कर औसतन 11,600 हो गए हैं। राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या भी 6 से बढ़कर 12 हो चुकी है और बाकी 27 जिलों में भी नए कॉलेज बन रहे हैं।

